भोपाल गैस त्रासदी के चार दशक के साक्ष्य

भोपाल गैस त्रासदी-भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय, जिसकी गंध आज भी हवा में बसी है, और जिसके आँसू चार दशक बाद भी सूखे नहीं हैं। इस असह्य पीड़ा, राजनीतिक दोगलेपन और मानवीय विवशता को बेबाकी से उजागर करती है वरिष्ठ अधिवक्ता, लेखक एवं पत्रकार विभूति झा की अत्यंत महत्वपूर्ण कृति 'कटघरे में साँसें भोपाल गैस त्रासदी के चार दशक'। यह पुस्तक केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि न्याय और संवेदना की उस अधूरी पुकार की गवाही है जो आज भी अदालतों, अस्पतालों और झुग्गियों की गलियों में सुनाई देती है। दो और तीन दिसंबर 1984 की भयावह रात जब यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से रिसी मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने हजारों जिंदगियों को पलभर में निगल लिया उसी त्रासदी की अनकही दास्तान इस पुस्तक के पृष्ठों में जीवित है। विभूति झा स्वयं उस दौर के अग्रणी अधिवक्ता और इस जन-आंदोलन के साक्षी रहे हैं। अतः उनकी लेखनी महज संवेदना नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभवों की गहराई से उपजा हुआ सत्य है। यह पुस्तक शासन और प्रशासन के गैर-जिम्मेदाराना रवैये, राजनीतिक सौदेबाजी और न्यायायिक उदासीनता का जीवंत  दस्तावेज बन जाती है। लेखक ने अत्यंत सूक्ष्मता से बताया है कि कैसे सुप्रीम कोर्ट में गैस पीड़ितों की न्याय याचिका असफल रही, और कैसे सत्ता के गलियारों में मानवता का गला घोंटा गया। 7 दिसंबर 1984 को यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन की गिरफ्तारी और तत्पश्चात मुख्यमंत्री निवास पर उनकी 'सम्मानजनक रिहाई' का प्रसंग पुस्तक के उन पृष्ठों में दर्ज है, जिन्हें पढ़ते हुए आज भी व्यवस्था की रीढ़ में सिहरन दौड़ जाती है। विभूति झा ने लिखा है कि कैसे तत्कालीन कलेक्टर मोती सिंह और पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी ने स्वयं एंडरसन को सुरक्षित दिल्ली रवाना किया 'सरकार ने विदेशी मेहमानों के स्वागत की भारतीय परंपरा का पूरा निर्वाह किया।' यह वाक्य व्यंग्य नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा पर जड़ा गया एक कटाक्ष है नर्म, किंतु भीतर तक चुभने वाला। पुस्तक की भूमिका वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने लिखी है। वे कहते हैं-

'करीब आधी सदी की पत्रकारिता के बाद मैंने ऐसा दूसरा विभत्स उदाहरण नहीं देखा कि मानवता को कलंकित करने वाले अपराधी बेखौफ घूमते रहे और पीड़ित लगातार छले जाते रहे।'

इसी तरह, प्रस्तावना लेखक एन. के. सिंह की है, जो लिखते हैं -

'भोपाल गैस त्रासदी तीसरी दुनिया के लोगों को कीड़े-मकोड़े समझने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लालच का परिणाम थी एक ऐसा हादसा जो घटने की प्रतीक्षा में खड़ा था।'

लेखक ने इस ग्रंथ को केवल वैचारिक नहीं, बल्कि दृश्यात्मक प्रमाणों से भी समृद्ध किया है। 92 वर्षीय छायाचित्रकार जगदीश कौशल और वरिष्ठ फोटोग्राफर आरसी साहू के ऐतिहासिक फोटोग्राफ इस किताब में जैसे समय की गवाही बनकर उभरते हैं। ये तस्वीरें त्रासदी की स्याही से नहीं, आंसुओं से धुली प्रतीत होती हैं।

'कटघरे में सांसें' पढ़ते हुए पाठक केवल भोपाल नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कटघरे में खड़ा हो जाता है जहाँ सवाल है कि चार दशक बाद भी न्याय अब तक क्यों ठहरा हुआ है?

यह किताब उस गहरी नींद को झकझोरती है, जिसमें हमने व्यवस्था की असफलता को अपनी नियति मान लिया है। विभूति झा का यह कार्य केवल लेखन नहीं, बल्कि चार दशकों का संचित श्रम, अनुभव और जिजीविषा का सार है। यह पुस्तक किसी रिपोर्ट से अधिक मानवीय करुणा का ग्रंथ है-एक ऐसा 'साक्ष्य' जो शब्दों से नहीं, सत्य से लिखा गया है।

'कटघरे में सांसें' निस्संदेह भोपाल गैस त्रासदी पर अब तक लिखी सभी पुस्तकों में सबसे अधिक प्रमाणिक, संवेदनशील और सारगर्भित कृति है।

इसे न केवल भारत में, बल्कि विश्वभर में पढ़ा जाना चाहिए ताकि मानवता के उस अपराध को कोई फिर दोहराने का साहस न कर सके।

पुस्तक : कटघरे में सांसें,
लेखकः विभूति झा,
प्रकाशकः प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग इंडिया,
मूल्यः 360 रुपये,

फ्लिपकार्ट, ऐमज़ान पर उपलब्ध